पूना पैक्ट : समझौते के बावजूद अंबेडकर ने गाँधी जी के लिए कहा था- मैं उन्हें महात्मा कहने से इंकार करता हूँ

अंबेडकर-पेरियार

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सितंबर 24, 1932 में आज ही के दिन महात्मा गाँधी और बीआर अंबेडकर (B.R. Ambedkar) के बीच भारी मतभेद और लम्बे विवाद के बाद ऐतिहासिक पूना पैक्ट (Poona Pact) का समझौता हुआ था। सितंबर 19, 1932 की सुबह बॉम्बे (जिसे अब मुंबई के रूप में जाना जाता है) में लोग भारी मात्रा में पहले से ही इंडियन मर्चेंट्स चैंबर हॉल के सामने बरामदे में मौजूद थे। उनकी प्राथमिकता आज के दिन सिर्फ और सिर्फ एक थी: महात्मा गाँधी का जीवन बचाना, जो लम्बी अवधि से अनशन पर हैं और उनके पास 24 घंटे से भी कम समय है।

हफ़्ते भर से गाँधी जी, जो कि राजद्रोह के आरोपों में पुणे की जेल में बंद रहे, और बीआर अंबेडकर (B.R. Ambedkar) के बीच तनाव जारी है। तमाम समाचार पत्र महात्मा गाँधी के घटते-बढ़ते रक्तचाप की खबरों से भरे पड़े हैं। वहीं, बीआर आंबेडकर, जो भारत की ‘बड़ी आबादी’ यानी, तथाकथित ‘अछूत’ वर्ग, जिन्हें आज अनुसूचित जाति (SC) कहा जाता है, के लिए संविधान में पृथक निर्वाचन अधिकार की माँग पर डटे थे। मगर गाँधी जी का तर्क था कि ऐसा कोई कानून तथाकथित अछूतों को न्याय दिलाने की मुहीम को कमजोर ही करेगा।

ब्रिटिश सरकार का साम्प्रदायिक पंचाट था विवाद का कारण

इस पूरे घटनाक्रम की नींव में था औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार का ‘साम्प्रदायिक पंचाट’! अगस्त 16, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मेकडोनाल्ड ने साम्प्रदायिक पंचाट या ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ (Communal Award or Macdonald Award) की घोषणा की थी।

यह अंग्रेजों द्वारा भारत में अपनाई गई ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का ही एक दूसरा उदाहरण था। इस निर्णय में मुस्लिम, सिख आदि की तरह ब्रिटिश सरकार ने तथाकथित अछूत वर्ग को भी हिंदुओं से अलग समुदाय की मान्यता दी।

लेकिन महात्मा गाँधी ने अछूतों को हिंदुओं से पृथक समुदाय की मान्यता का कड़ा विरोध किया था लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैकडोनल्ड ने गोलमेज सम्मेलन में डॉ बीआर अंबेडकर द्वारा प्रस्तुत किए गये तथ्यों और तर्कों को उचित मानते हुए अछूतों को पृथक निर्वाचक मण्डल सहित दो मतों का अधिकार प्रदान किया।

महात्मा गाँधी द्वारा इस सिद्धांत का विरोध किया गया था। लेकिन उन्होंने मुस्लिमों या सिखों के लिए समान प्रावधानों पर कोई आपत्ति नहीं जताई। उन्होंने 18 अगस्त को तत्कालीन ब्रिटिश पीएम, रेम्जे मैकडोनाल्ड को लिखा, “मुझे अपनी जिंदगी को दाँव पर लगाकर इस निर्णय का विरोध करना है। मैं उनके जरा से भी वैधानिक अलगाव के खिलाफ हूँ….।”

महात्मा गाँधी ने इस बात को 09 सितंबर तक भी दोहराया, लेकिन अंग्रेजों ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। दलितों के हितैषी बीआर अंबेडकर (B.R. Ambedkar) ने कहा कि वह गाँधी की खातिर एक ‘जायज माँग’ का बलिदान नहीं करेंगे, खासकर जब कोई वैकल्पिक प्रस्ताव पेश नहीं किया गया था।

दरअसल, अंबेडकर ने महात्मा गाँधी पर आरोप लगाया कि वो हिन्दुओं और डालतिओं के बीच की खाई को और चौड़ी कर रहे हैं। जबकि, महात्मा गाँधी का मानना था कि दलितों को पृथक समुदाय और निर्वाचन देना भारतीय समाज को और अधिक टुकड़ों में बाँट देगा। उनका मानना था कि छुआछूत हिन्दू धर्म का अंग नहीं है और हिन्दुओं में अस्पृश्यता कलंक है लेकिन निकट भविष्य में यह ख़त्म हो जाएगी, लेकिन पृथक निर्वाचन इस घाव को हमेशा हरा रखेगा और अछूतों अस्तित्व को खतरे में ही डालेगा।

गोलमेज सम्मेलन और पूना पैक्ट

महात्मा गाँधी का अनशन

आखिर में गाँधी ने अगले दिन, सितम्बर 20, 1932 को पूना की यरवदा जेल में अछूतों को मिले ‘पृथक निर्वाचन मण्डल’ तथा दो मतों के अधिकार के विरोध में आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया।

अचानक सभी समाचार पत्र महात्मा गाँधी के गिरते स्वास्थ्य की दैनिक बुलेटिन से भर गए। कॉन्ग्रेस नेताओं ने अंबेडकर को समझौता करने के लिए उकसाया। अंबेडकर ने कॉन्ग्रेस से कहा, ”अगर मुझे फाँसी पर भी चढ़ा दिया जाए तब भी मैं लोगों के साथ विश्वासघात कर अपने पवित्र कर्तव्य से नहीं डिग सकता।”

अंबेडकर को कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक द्विस्तरीय प्रणाली का प्रस्ताव दिया: एक प्राथमिक चुनाव, जहाँ केवल दलित वोट देंगे और एक माध्यमिक चुनाव, जहाँ हर कोई पात्र होगा। 22 सितंबर की सुबह, अंबेडकर ने पुणे की यात्रा की और दोपहर में गाँधी से मिले।

महात्मा गाँधी के सचिव महादेव देसाई के नोट्स के अनुसार, अंबेडकर ने गाँधी जी से कहा, “मैं अपने समुदाय के लिए राजनीतिक शक्ति चाहता हूँ। हमारे जीवित रहने के लिए यह बेहद आवश्यक है।”

लेकिन इसमें एक अड़चन थी। अंबेडकर चाहते थे कि प्राथमिक चुनाव प्रणाली एक दशक के बाद स्वत: समाप्त हो जाए, और 15 साल बाद तथाकथित दबे-कुचले वर्ग के बीच जनमत संग्रह पर सशर्त सीटें आरक्षित कर दी जाएँ। कई हिंदू नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया था और गाँधी खुद पाँच साल बाद जनमत संग्रह चाहते थे।

23 सितंबर को फिर बातचीत हुई। अपनी किताब ‘डॉ अंबेडकर और अस्पृश्यता’ में, लेखक क्रिस्टोफ जाफरलॉट ने लिखा कि अगली सुबह, देवदास गाँधी (महात्मा गाँधी के चौथे और सबसे छोटे पुत्र) ने तिलमिलाकर कहा, “पिता मर रहे हैं।” उन्होंने अपनी किताब में जिक्र किया कि अंबेडकर के समक्ष उनकी आँखों में आँसू थे।

महाराष्ट्र के लगभग सभी प्रमुख अखबार गाँधी का समर्थन और अंबेडकर का विरोध कर रहे थे। गाँधी जी के घटते बढ़ते ब्लड प्रेशर से लेकर उनकी गिरती हालत समाचार की बड़ी खबर होती।

पूना पैक्ट

अंबेडकर ने अंत में कहा कि अगर वे गाँधी के जीवन के लिए समझौता नहीं करते तो दलितों को पूर्वग्रह से जूझना पड़ेगा। आखिरकार, पूना समझौते पर 24 सितंबर को शाम 5 बजे 23 लोगों ने हस्ताक्षर किए। मदन मोहन मालवीय ने इसे हिंदुओं और गाँधी की ओर से और अंबेडकर ने अछूत वर्गों की ओर से हस्ताक्षर किए। इस समझौते में दलितों के लिए अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार खत्म हो गया। अंग्रेजों द्वारा दी गई 80 सीटों के बजाय अछूत वर्गों को 148 सीटें मिलीं।

पूना पैक्ट के समय की तस्वीर (चित्र साभार: भारत ज्ञान)

कहा जाता है कि अंबेडकर ने गाँधी जी की इस हठ को बेमन से स्वीकार किया था और इस समझौते पर राजी हुए थे। बीआर अंबेडकर ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करते समय गाँधी जी से कहा था, “यदि आप अछूत वर्गों के कल्याण के लिए पूरी तरह से खुद को समर्पित करते हैं, तो आप हमारे नायक बन जाएँगे।”

हालाँकि, अंबेडकर के हृदय में गाँधी जी को लेकर नफरत उनकी मृत्यु के बाद भी जीवित रही। अंबेडकर ने पूना पैक्ट वार्ता के दौरान गाँधी के रुख को एक राजनेता का रुख कहा। बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में अंबेडकर ने कहा था, “एक राजनीतिज्ञ के रूप में, वह कभी महात्मा नहीं थे। मैं उन्हें महात्मा कहने से इंकार करता हूँ।”

काँशीराम ने कहा था ‘चमचा युग’ की शुरुआत

पूना पैक्ट का अछूत समाज के बड़े नेताओं ने विरोध किया था। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक काँशीराम ने पूना पैक्ट के बाद के युग को चमचा युग कहा और समझौते के 50 साल पूरे होने पर सितंबर 23, 1982 को अपनी एक किताब प्रकाशित की। इस किताब का नाम था – ‘एन एरा ऑफ स्टूजेज’ यानी ‘चमचा युग।’ काँशीराम ने लिखा था कि पूना पैक्ट की वजह से ही दलित अपने वास्तविक प्रतिनिधि चुनने से वंचित कर दिए गए।

पूना पैक्ट को लेकर महात्मा गाँधी की हठ कितनी सही या गलत थी, इस बात का विश्लेषण करने के लिए शायद मेरा कद बहुत छोटा है लेकिन यह कई समकालीन नेताओं ने माना था कि यह निश्चित ही औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य की भारत और इसकी अखंडता में सेंध लगाने का ही एक उपक्रम था। और यदि तथाकथित अछूत वर्ग को पृथक निर्वाचन देने की बात बनी रहती तो पाकिस्तान की ही तरह भारत का शायद एक और हिस्सा टूट चूका होता।

महात्मा गाँधी ने कहा था कि आज नहीं तो कल हिन्दू अपने विषयों से उबार आएँगे और समय के साथ यह एक बड़े स्तर तक साकार भी हो रहा है। आज भारत के राष्ट्रपति के पद पर एक अनुसूचित जाति का व्यक्ति है। राजनीति से लेकर कई प्रमुख संस्थाओं में, बिना किसी पृथक निर्वाचन के ही, अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व है।

यह नहीं कहा जा सकता कि अस्पृश्यता भारत के समाज से पूर्ण रूप से गायब हो गई हो, लेकिन यह जन चेतना लोगों के बीच जरुर पैदा हुई है कि हिन्दुओं के बीच अस्पृश्यता एक कलंक है और इससे आज नहीं तो कल, लेकिन हिन्दू ही मिलजुलकर उबरेंगे।

पूना पैक्ट का नतीजा

पूना पैक्ट के अंबेडकर के लिए भी व्यक्तिगत तौर पर कई सकारात्मक परिणाम हुए। इसने पूरे भारत में वंचित वर्गों के नेतृत्व को सशक्त रूप से उनके नाम कर दिया। उन्होंने न केवल कॉन्ग्रेस, बल्कि पूरे देश को ही नैतिक रूप से दबे हुए वर्गों के उत्थान के लिए जिम्मेदार ठहराया। इतिहास में पहली बार वंचित वर्गों को एक राजनीतिक ताकत बनाने में भी अंबेडकर सफल रहे।

अंबेडकर ने खुद स्वीकार किया था कि वह एक पूर्ण समाधान नहीं बल्कि अल्पकालीन और त्वरित कोई फैसला चाहते थे। उनका कहना था कि वह इन्तजार नहीं करना चाहते थे लेकिन उन्हें गाँधी और कॉन्ग्रेस की जिंदगी के लिए यह फैसला लेना पड़ा।



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