अंतरधार्मिक शादी की सज़ा? 5 साल जेल, दोनों बच्चे भी ग़ायब!

5 साल की मुश्किल भरी जेल-याफ़्ता ज़िंदगी से किसी तरह पिंड छुड़ा कर बीते शुक्रवार की शाम नज़मा और नरेंद्र जब आगरा ज़िला जेल के दरवाज़े से बाहर आए तो उनके चेहरे सुख की बजाय दुःख की रेखाओं से घिरे थे। तब से लेकर 60 घंटे बीत जाने के बावजूद (इन पंक्तियोंके लिखे जाने तक) वे दर-दर, गली-गली भटकते अल्पायु के अपने उन 2 मासूम बच्चों को तलाश रहे हैं जो 5 साल पहले जेल में दाखिल होने के बाद से उनकी आँखों से ओझल हो गए थे।

यूपी में लव जिहाद के नाम पर युवा दंपत्ति की घेराबंदी करना कोई हालिया मसला नहीं। सालों पहले नरेंद्र और नज़मा ने इसे तब महसूस किया था जब निरपराध होने के बावजूद उन्हें हत्या के एक झूठे मामले में अभियुक्त बनाकर जेल भेज दिया गया था। लव जिहाद का क़ानून नहीं था लिहाज़ा आईपीसी की धाराओं के अंतर्गत दूसरे जघन्य अपराधों में लपेटने के दौर तब भी चलते थे। पुलिस तब भी कठमुल्ला सोच वाली थी जब उनके आला अफ़सर अखिलेश यादव थे और अब भी, जबकि उनके हुक़्मरान योगी आदित्यनाथ हैं। सामाजिक घृणा की सज़ा तब भी युवा दंपत्ति को भुगतनी पड़ती थी और अब भी। इस राजनीतिक सोच का खामियाज़ा भुगतने को उनकी मासूम संतानें तब भी अभिशप्त थीं और अब भी।

हत्या के जिस मामले में वे लम्बे समय से कारावास में थे उस पर आगरा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने न सिर्फ़ इस दंपत्ति को निरपराध घोषित किया बल्कि उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजी से लेकर एसएसपी (आगरा) तक को उक्त मामले में ज़िम्मेदार पुलिस आइओ और प्रॉसिक्यूशन से जुड़े अन्य पुलिसकर्मियों के विरुद्ध ग़ैर ज़िम्मेदारी का अभियोग दर्ज करके कार्रवाई करने, कथित अभियुक्तों को पाँच साल की अनर्थ जेल भुगतने के एवज़ में मुआवज़ा देने और हत्या के मामले में नए सिरे से जाँच शुरू करने के आदेश जारी किये हैं। नज़मा और नरेंद्र इन सारे आदेशों से संतुष्ट नहीं हैं। उनकी असली टीस है अपने बच्चों से मिलने की चाह, जिनका अभी दूर-दूर तक पता नहीं है।

दुःख-दर्द की अनेक परतों से घिरी नज़मा और नरेंद्र की हौलनाक दास्ताँ न सिर्फ़ भारतीय पुलिस तंत्र के अंधे और बहरे जिस्म पर चढ़ी क्रूरता की कलई को उघाड़ देती है बल्कि मानवाधिकारों के हनन के प्रति आम भारतीय के मन को संदेह से भरे सवालों के दरिया में डूबने-उतराने को मजबूर कर देती है। 

उनके साथ घटी इस दुर्घटना ने न केवल उनके जीवन के 5 प्रेम भरे सक्रिय सालों को कारावास के सींखचों के पार के निष्प्राण जीवन में परिवर्तित कर दिया बल्कि उनके 5 साल के अबोध बेटे और 3 साल की शिशुवत बेटी से उनका समूचा बचपन ही छीन लिया गया।

मोहल्ला जरार (थाना बाह) ज़िला आगरा, उत्तर प्रदेश में 1 सितम्बर 2015 की सुबह ‘कोतवाल धर्मशाला’ में बने प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे स्कूल शुरू होने से पहले जब मटरगश्ती के भाव में धर्मशाला की छत पर चढ़ जाते हैं तो बगल वाले ब्रह्मचारी गुप्ता के बंद पड़े मकान की छत पर अबोध शिशु जीत उर्फ़ चुन्ना का शव देखते हैं, जिसके पिता योगेंद्र सिंह ने एक दिन पहले ही अपने बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई थी। नज़मा और नरेंद्र कोतवाल धर्मशाला की इसी दूसरी मंज़िल के किरायेदार थे। दोनों पति-पत्नी धर्मशाला के सामने ही खोखे में चूड़ियाँ बेचने का काम करते थे। पास के सीमावर्ती मध्य प्रदेश के भिंड ज़िले की रहने वाली नज़मा ने कुछ वर्ष पहले ही जरार के नरेंद्र के साथ अंतरधार्मिक प्रेम विवाह किया था। नरेंद्र इसी स्कूल में छोटी-मोटी तनख़्वाह पर टीचरी भी करता था। पुलिस चौकी जरार को सूचित करने को उसे ही भेजा गया। नज़मा को पास में ही मृतक के घरवालों को इत्तलाह देने को भेज दिया गया। 8.30 बजे पुलिस वहाँ पहुँची।

निर्दोष होने की दलीलें नहीं सुनीं!

साढ़े 9 बजे दोनों पति-पत्नी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। वे अपने निरपराध होने का रोना रोते रहे। उनके इस रोने-धोने पर न बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखने वाला योगेंद्र सिंह पसीजा, न पुलिस। बाद में घटना स्थल पर डॉग स्क्वाड पहुँचा और 'फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट' भी। अगले दिन अपराह्न 2.30 बजे केस दर्ज हुआ। यानी 36 घंटे से ज़्यादा समय तक दंपत्ति अवैध रूप से पुलिस हिरासत में रहे। नज़मा अपने अबोध बेटे अजीत (5) तथा बेटी अंजू (3) के लिए बिलखती रही। इसी शाम ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने हाज़िरी लगवाकर दोनों को जेल भेज दिया गया।

पाँच साल तक चले मुक़दमे में डिफेन्स के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता वंशो बाबू ने पुलिस और अभियोजन पक्ष की कहानी के परखचे उड़ा दिए। वस्तुतः अभियोजन का होमवर्क ही बेहद कमज़ोर था। पंचनामा के पहले पृष्ठ पर ही उप विवेचना अधिकारी एसआई ने स्वीकार किया था कि उसे नहीं मालूम कि अभियुक्तगण कौन थे!

पुलिस के मुख्य एविडेंस-ट्रक ड्राइवर बाकल सिंह को कोल्ड स्टोरेज के ड्राइवर के तौर पर पेश किया गया। डिफेन्स विटनेस के रूप में पेश हुए कोल्ड स्टोरेज के मालिक ने बाकल सिंह के अपने कोल्ड स्टोरेज से किसी क़िस्म से सम्बंधित होने से ही इंकार कर दिया। बाकल सिंह यह भी नहीं बता पाया कि ट्रक का मालिक कौन था। 

पुलिस आइओ कोर्ट में यह भी नहीं बता सका कि उसे बाकल सिंह के आइडेंटिफिकेशन की बाबत कोल्ड स्टोरेज से दरयाफ़्त करने की ज़रूरत क्यों नहीं सूझी।

रिहा होने के बाद नरेंद्र ने 'सत्य हिंदी' को बताया कि वादी योगेंद्र सिंह उससे तब से चिढ़ता था जब उसने अंतरधार्मिक विवाह किया था। “जरार के उस मोहल्ले में हमारे रिश्तों से नाराज़ रहने वालों का एक बड़ा झुण्ड था। उन्होंने पुलिस को भी हमारे ख़िलाफ़ यही कहानी सुनाकर भड़काया।” वंशो बाबू एडवोकेट ने 'सत्य हिंदी' को बताया, “पुलिस ने स्थानीय लोगों के दबाव में मुक़दमा क़ायम किया। उन्होंने चार्जशीट दायर करते समय सच्चाई की रत्ती भर भी तस्दीक़ नहीं की।"

अपने फ़ैसले में विद्वान न्यायाधीश ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ने पुलिस महकमे के डीजी को पुलिस आइओ ब्रह्मसिंह के विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए। उन्होंने अभियोजन पक्ष को नोटिस जारी करके पूछा कि क्यों न निरपराध अभियुक्तों के लिए उनसे मुआवज़ा वसूल किया जाए। फ़ैसले में एसएसपी (आगरा) को पूरे मामले की पुनर्विवेचना के आदेश दिए हैं ताकि असली हत्यारों की धरपकड़ हो सके।

जेल से रिहा दोनों पति-पत्नी अभिशप्त से हाल में अपने दोनों बच्चों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। बाह पुलिस के रिकॉर्ड में उनके बच्चों को आगरा के अनाथालय में भेजना दर्शाया गया है। आगरा अनाथालय का रिकॉर्ड उसे फ़िरोज़ाबाद भेजना बता रहा है। फ़िरोज़ाबाद अनाथालय में बच्चे हैं नहीं। उनका रिकॉर्ड कुछ नहीं बोलता लेकिन वहाँ का पुराना स्टाफ़ बताता है कि बच्चों को कानपुर अनाथालय स्थानांतरित कर दिया गया था।

वंशो बाबू एडवोकेट कहते हैं, "क़ानूनन इस दशा में 10 वर्ष से नीचे आयु वाले बच्चों को राजकीय शिशु सदन में भेजा जाता है। पुलिस ने उन्हें अनाथालय भेज कर ग़ैर क़ानूनी काम किया है जिसके विरुद्ध वह अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं।"



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