संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद: भारत को भी मिले ‘वीटो’ का अधिकार

संयुक्त राष्ट्र संघ के 75 वें अधिवेशन के उद्घाटन पर दुनिया के कई नेताओं ने भाषण दिए लेकिन उन भाषणों में इन नेताओं ने अपने-अपने राष्ट्रीय स्वार्थों को परिपुष्ट किया, जैसा कि वे हर साल करते हैं। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल उठाए, जो विश्व राजनीति के वर्तमान नक्शे को ही बदल सकते हैं। उन्होंने सुरक्षा परिषद के मूल ढांचे को ही बदलने की मांग रख दी। 

इस समय दुनिया में अमेरिका और चीन ही दो सबसे शक्तिशाली राष्ट्र हैं। आजकल दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध मुक्का ताने हुए हैं। उनके नेता डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग ने एक-दूसरे को निशाना बनाया हुआ है। 

चीन-अमेरिका की लड़ाई 

ट्रंप ने दुनिया में कोरोना विषाणु फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया और चीन ने कहा कि अमेरिका सारी दुनिया में राजनीतिक विषाणु फैला रहा है। शी जिनपिंग ने कहा कि चीन की दिलचस्पी न तो गर्म युद्ध में है और न ही शीत युद्ध में। मोदी ने अपने आप को इस चीन-अमेरिकी अखाड़ेबाजी से बचाया और सुरक्षा परिषद का विस्तार करने की बात कही। उन्होंने कहा कि जमाना काफी आगे निकल चुका है लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ 75 साल पहले जहां खड़ा था, वहीं खड़ा है। 

सुरक्षा परिषद के सिर्फ पांच सदस्यों को वीटो (निषेध) का अधिकार है यानी उन पांच सदस्यों में से यदि एक सदस्य भी किसी प्रस्ताव या सुझाव को वीटो कर दे तो वह लागू नहीं किया जा सकता। यानी उनमें से कोई एक राष्ट्र भी चाहे तो सारी सुरक्षा परिषद को ठप कर सकता है। 

ये पांच राष्ट्र हैं- अमेरिका, चीन, रुस, ब्रिटेन और फ्रांस! इन पांचों को यह निषेधाधिकार क्यों मिला था क्योंकि द्वितीय महायुद्ध (1939-45) में ये राष्ट्र हिटलर, मुसोलिनी और तोजो के ख़िलाफ़ एकजुट होकर लड़े थे। जो जीते हुए राष्ट्र थे, उन्होंने बंदरबांट कर ली। 

पांच देशों की कठपुतली

संयुक्त राष्ट्र यूं तो लगभग 200 राष्ट्रों का विश्व-संगठन है लेकिन इन पांच शक्तियों के हाथ में वह कठपुतली की तरह है। उसकी सुरक्षा परिषद में न तो कोई अफ्रीकी, न लातीन-अमेरिका और न ही कोई सुदूर-पूर्व का देश है। भारत-जैसा दुनिया का दूसरा बड़ा राष्ट्र भी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। 10 अस्थायी सदस्यों में इस वर्ष भारत भी चुना गया है। 

पांचों महाशक्तियां अपना मतलब गांठने के लिए गोलमाल शब्दों में भारत को स्थायी सदस्य बनाने की बात तो करती हैं लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। भारत के नेता भी दब्बू हैं। वरना, आज तक उन्होंने ये मांग क्यों नहीं की कि या तो वीटो (निषेधाधिकार) खत्म करो या चार-पांच अन्य राष्ट्र को भी दो। वीटो अधिकार का कोई सुनिश्चित आधार होना चाहिए। भारत चाहे तो वह संयुक्त राष्ट्र के बहिष्कार की भी धमकी दे सकता है और अपने साथ दर्जनों राष्ट्रों को जोड़ सकता है।

(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

(डॉ. वेद प्रताप वैदिक के ब्लॉग www.drvaidik.in से साभार)



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